अखाडा और अखाडेबाज़ी
वह एक ज़माना था जब किसी गांव मेँ
अखाड़ा होना, वहाँ वालोँ के लिये शान की बात हुआ करती थी –
अब गांव मेँ अखाड़ा होने न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता है क्योंकि गली-गली, कोने-कोने अखाड़ेबाज़ी होने लगी है. तब प्रतिद्वंद्वी पहलवान चित किये जाते
थे, अब विपक्षी नेता चित किये जाते हैं- और मौका लग जये तो
धराशायी भी. मेरे गांव मेँ भी एक अखाड़ा हुआ करता था, जहाँ
प्रातःकाल पहुंचकर लंगोट पहनना, तेल-मालिश करना और मिट्टी
मेँ सन कर कुश्ती के दांव-पेंच लगाना गांव वालोँ का वैसा ही गर्वीला शौक हुआ करता
था, जैसा आजकल शहर वालोँ का जिम जाने का होता है. व्यक्तिगत रूप से मुझे अखाड़ा और
अखाड़ेबाज़ी दोनोँ से बचपन से चिढ़ रही है, परंतु अखाड़ा और
अखाड़ेबाज़ी दोनोँ मेरे जीवन से उतने ही चिपके रहे हैँ. यद्यपि प्रातः की स्वप्निल
निद्रा खराब कर गांव के किनारे बने अखाड़े पर पहुंचना, लँगोट
पहनना, तल मालिश करना और फिर कुश्ती मेँ पटखनी खाने का मुझे
कोई शौक नहीँ था, तथापि बचपन मेँ बडे लोगोँ के दबाव मेँ मुझे
प्रतिप्रातः अपने गांव के अखाड़े पर जाना पड़ता था. मेरी
चिढ़ का एक गोपनीय कारण भी था कि मेरे से बडे कई पहलवान जब मेरे जैसे छोटे पहलवानोँ
का लँगोट पीछे से पकड़कर हमेँ उलटकर पटखनी लगाते थे, तो यदा-कदा
अपनी उंगलियोँ की लम्बाई का अनावश्यक उपयोग भी उस प्रक्रिया मेँ कर देते थे.
आयु
बढ़ने पर मुझे पता चला कि घर के बड़े लोग मुझे अखाड़े पर जाने को इसलिये बाध्य करते
थे कि आगे चलकर मै ज़मींदारी की अखाड़ेबाज़ी मेँ प्रतिद्वंद्वियोँ को आसानी से पटखनी दे
सकूँ. मेरे खानदान की एक छोटी सी ज़मीँदारी थी. यह ज़मीँदारी दो परिवारोँ मेँ बँटी
हुई थी. अब बँटी हुई ज़मीँदारी मेँ यदि अखाड़ेबाज़ी न हो, तो
बंटी हुई ज़मीँदारी का मज़ा ही क्या. इस अखाड़ेबाज़ी का मज़ा लेते हुए मेरे सगे ताऊ और
चचेरे बाबा को आपस मेँ मुकदमेँबाज़ी की ऐसी लत लग गई थी, कि
यदि अगले दिन कचहरी मेँ तारीख पर न जाना हो, तो उनकी रात
करवटेँ बदलते ही बीतती थी. यदि आप का बचपन भी गांव मेँ बीता है, तो जानते होँगे कि गांव मेँ मुकदमेँबाज़ी और अखाड़ेबाज़ी एक दूसरे के पूरक
होते थे. अतः मेरा गांव भी अखाड़ेबाज़ोँ के दो गुटोँ मेँ बँटा हुआ था. इस बाँट मेँ
मेरे ताऊ और बाबा तो ऐसे बँटे हुए थे जैसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान की क्रिकेट टीम
– जो हारा उसकी थू-थू और जो जीता उसकी पौ-बारह. गांव के अन्य लोग ऐसे बँटे हुए थे
जैसे क्रिकेट मैच के दर्शक – स्टेडियम के भीतर एक-दो बियर चढ़ाकर अपनी टीम के हर खिलाड़ी
के आउट होने पर ऐसे मुरझा जाने वाले जैसे नानी स्वर्ग सिधार गईँ होँ, परंतु स्टेडियम से बाहर निकलते ही होठोँ पर ऐसी मुस्कान जैसे नानी जी
पुनः सतर खड़ी हो गईँ होँ. जहाँ तक मेरा प्रश्न है तो मेरा मानसिक ‘गेट-अप’ ही अखाड़ेबाज़ी से इतना अलग-थलग था कि मुझे ताऊ-बाबा
और दोनो तरफ के दर्शकोँ की ये हरकतेँ ऐसीँ लगतीँ थीँ जैसे वे अखाड़े मेँ अपनी
उंगलियोँ की लम्बाई का अनावश्यक उपयोग एक दूसरे के ऊपर कर रहे होँ.
मेरे मन को तब बड़ी शाँति मिली थी जब
मेरी किशोरावस्था के दौरान ज़मीँदारी पृथा समाप्त हो गई थी. यद्यपि उस दिन मेरे घर मेँ दिये नहीँ जले थे और मेरे ताऊ और बाबा दोनोँ
ने खाना नहीँ खाया था, तथापि मैँ आश्वस्त हो गया था कि
ज़मीँदारी की अखाड़ेबाज़ी से मुझे जूझना नहीँ पड़ेगा. पर मुझे क्या पता था कि ‘आसमान से गिरे और खजूर मेँ अटके’ वाली कहावत मेरे
जैसोँ के लिये ही बनाई गई थी? हुआ यह कि मैँ बैठा आई. ए. एस.
की प्रतियोगी परीक्षा मेँ और चुन लिया गया आई. पी. एस. मेँ, जहाँ
दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है अखाड़ेबाज़ोँ से निपटना. जैसे जैसे सूरज चढ़ता था
मेरे कैम्प-आफिस (घर के दफ्तर) पर अखाड़ेबाज़ोँ द्वारा चित किये हुए फरियादियोँ एवँ
उन अखाड़ेबाज़ोँ के बचाव मेँ आये हुए उनसे बड़े अखाड़ेबाज़ोँ का जमावड़ा लगने लगता था.
आराम से चाय पीना तो दूर की बात थी, बाथरूम मेँ भी लम्बी
डोरी का फोन लेकर जाना पड़ता था क्योँकि लखनऊ मेँ बैठे उच्चस्थ अखाड़ेबाज़ोँ मेँ बड़े
सबेरे से ही बेचैनी होने लगती थी कि पुलिस उनके अखाड़े के किसी चेले को सीखचोँ के
अंदर न कर दे. इन लखनउआ अखाड़ेबाज़ोँ की एक विशेषता का मै कायल हूँ कि चाहे आपस मेँ जानलेवा
अखाड़ेबाज़ी हो, बदमाशोँ को पुलिस से बचाने और पारस्परिक
भृष्टाचार पर पर्दा डाले रखने के विषय मेँ इनमेँ कोई मतभेद नहीँ होता था. जब से
देश की अर्थव्यवस्था मेँ सुधार और हमारे मूल्योँ मेँ गिरावट आयी है, इन नेताओँ के विभिन्न अखाड़ोँ मेँ स्वप्रजाति को भृष्टाचार के अधिकतम अवसर
प्रदान करने हेतु एक खुली प्रतियोगिता भी प्रारम्भ हो गई है.
इसी के कारण प्रत्येक बजट-सत्र के दौरान विधायक-निधि,
सांसद-निधि, मनरेगा, आंगनबाड़ी, मध्यान्ह-भोजन जैसी कमाऊ योजनाओँ पर अनुदान बढ़ जाता है और प्रत्येक सत्र के उपराँत विधायकोँ-
सांसदोँ का वेतन एवँ उनकी सुख-सुविधाओँ पर अनुदान सुरसा के मुख की भाँति विस्तृत
हो जाता है.
जिस प्रकार प्रत्येक प्रकार के विष से
अधिक ज़हरीला एक और विष होता है, उसी प्रकार अखाड़ेबाज़ नेताओँ से
भी ऊंचे अखाड़ेबाज़ उनके गुरु लोग होते हैँ. ये भगवा वस्त्र
पहने, माथे मेँ चंदन लगाये, और कोई-कोई
बुशशर्ट-पैँट मेँ सिगरेट फूँकते हुए भी सचिवालय और उच्चाधिकारियोँ के दफ्तरोँ के
चक्कर लगाते दिखाई पड़ते हैँ. यदि अधिक पहुंचे हुए गुरू हुए,
तो उनके यहाँ मंत्री और अधिकारी स्वयँ चक्कर लगाते हैँ. अखाड़ेबाज़ी करते-करते इनकी
ज़ुबान पर सरस्वती का ऐसा वास हो जाता है, कि किसी मँत्री या
अफसर को देखते ही इनके मुख से उसकी प्रोन्नति अथवा समृद्धि विषयक ऐसी भविष्यवाणी
निकल जाती है, कि वह रोमाँचक अचरज मेँ डूबकर इनका मुरीद हो
जाता है. यदि वह मँत्री या अफसर भी अखाड़ेबाज़ी मेँ रुचि रखने वाला हुआ, तो शीघ्र ही गोटी से गोटी फिट हो जाती है और स्थानांतरण, प्रोन्नति से लेकर क्रय-विक्रय आदि के दुधारू खेल मेँ दलाली का राष्ट्रीय
धँधा फलने-फूलने लगता है.
अखाड़ेबाज़ी
के एक नये स्वरूप से मेरा सामना तब हुआ, जब मैँ फैज़ाबाद
मेँ पुलिस अधीक्षक नियुक्त हुआ. वहाँ अयोध्या मेँ ‘साधुओँ’ के अनेक अखाड़े थे जिनकी चेलागीरी बड़े बड़े नेता करते थे. इन अखाड़ोँ मेँ आपस
मेँ वैसी ही हम-बड़े-कि-तुम वाली प्रतिस्पर्धा, वैमनस्यता, और उठापटक चलती रहती थी जैसी विगत सदी की रियासतोँ मेँ चलती थी. जेठ के
महीने मेँ एक सायँ जिस दिन हनुमानगढ़ी पर भक्तोँ की अपार भीड़ आयी थी, मुझे वायरलेस से सूचना मिली थी कि वहाँ के साधुओँ ने एक दूसरे पर बम फेँक
कर अपने वानर होने का सजीव प्रमाण प्रस्तुत कर दिया था. इस बमबाज़ी मेँ अनेक साधु
घायल हो गये थे. ‘साधुओँ’ की एक-दूसरे
पर की गई इस अहैतुकी ‘कृपा’ के विषय
मेँ जानकारी करने पर मुझे एक बड़ा ही सबल कारण ग्यात हुआ था कि हनुमान जी पर चढ़ाये
गये प्रसाद के वितरण मेँ महंतोँ द्वारा की गई धाँधली से क्रोधित बाबाओँ ने एक
दूसरे पर बमबाज़ी कर दी थी. बाद मेँ मठाधीश ने मामले को यह सोचकर दबा दिया था कि
प्रसाद की अधिकाधिक मात्रा प्राप्त करने की लालसा साधुओँ की हनुमानभक्ति की
पराकाष्ठा की द्योतक है. खुफिया पुलिस द्वारा जाँच कराने पर मुझे पता चला था कि
हनुमान गढ़ी के अनेक साधुओँ को बाबा बनने के पहले भी बमबाज़ी का शौक रहा था. उनके
साधुवेश मेँ रूपांतरण का कारण भी उनके विरुद्ध बमबाज़ी के अभियोगोँ मेँ पुलिस की
पकड़ से बचना था.
वर्ष 2001 मेँ मैँ जब उत्तर प्रदेश
पुलिस के उच्चतम पद पर था, तब मुझे अखाड़ोँ के उच्चतम शिखर से
पाला पड़ा था. उसी वर्ष पूर्ण कुम्भ पड़ा था, जिसमेँ अखाड़ोँ के
महंतोँ के मिथ्या अहम, उनकी लिप्सा,
महत्वाकांक्षा एवँ दूसरे अखाड़ोँ को अपने से निम्नतर दिखाने के षड़यंत्रोँ के छिपे-मुंदे
स्वरूप के साक्षात दर्शन हुए थे. अपने अखाड़े को सबसे बड़ा साबित करने के लिये
किराये के साधुओँ की भरती करने, दूसरोँ के प्राणोँ को संकट
मेँ डालकर अनगिनत हाथी-घोड़े लाने, अपने अखाड़े के लिये अधिकतम
भूमि के अवंटन हेतु एवँ शाही स्नान के जुलूस मेँ उसे सबसे आगे स्थान दिलाने हेतु
झगड़ने, रूठने, धमकियाँ देने एवँ
विद्वेष फैलाने के इनके गुण किसी भी ‘मैनेजमेंट गुरु’ के लिये सीखने की चीज़ हो सकते हैँ. पर इन बेचारे महंतोँ का भी क्या दोष? बलिहारी तो उन भक्तोँ की है जो ये सारी करतूतेँ देखते हुए भी इन साधुओँ
की चरण रज लेने और शाही स्नान के जुलूस मेँ अखाड़े की वरीयता के अनुसार उन पर पैसा
लुटाने को जी-जान से उद्यत रहते हैँ.
मेरे पुलिस विभाग से सेवानिवृत
होने पर कतिपय राजनैतिक दलोँ के नेताओँ एवँ शुभचिंतकोँ ने मुझे राजनीति के अखाड़े
मे कूद पड़ने हेतु चुग्गा डाला था, परंतु अखाड़ेबाज़ी से अपनी
नैसर्गिक चिढ़ के कारण मैँ उस बूबी-ट्रैप मेँ फँसने से साफ बच निकला.
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